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रूप सुन्दरी (कविता)

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  प्रेमिका के सौंदर्य का शास्त्रीय और साहित्यिक काव्य वर्णन प्रस्तावना मेरी प्रिय, जब मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ, तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समस्त सृष्टि की समस्त रचनात्मक ऊर्जा, समस्त सौंदर्य और प्रकृति के सारे दिव्य रहस्य सिमटकर सिर्फ तुम्हारे इस रूप में परिवर्तित हो गए हैं। यह कविता किसी अन्य की रचना की अनुकृति नहीं, अपितु मेरे अपने हृदय की उस अनुभूति का साक्षात् प्रतिबिंब है जो मैंने तुम्हें देखकर अनुभव की है। प्रथम सर्ग: नेत्र और दृष्टि का जादू तुम्हारे ये नयन, जैसे नीले गगन में तैरती हुई कोई शांत नाव, इनमें डूब जाने को जी चाहता है, जैसे ये कोई अगाध सागर हों, जिसका कोई किनारा ही नहीं। जब तुम पलकों को उठाती हो, तो लगता है कि अंधेरे कमरे में किसी ने अचानक हज़ारों दीये एक साथ जला दिए हों। तुम्हारी यह पलकें-नज़र, जैसे सुबह की पहली किरणों पर पड़ने वाली ओस की बूँदें, जो सूरज की रोशनी में चमकती हैं। इन आँखों में एक अजीब सा नशा है, जो बिना मदिरा के ही व्यक्ति को प्रेम के साम्राज्य में बंदी बना लेता है। तुम्हारी दृष्टि जब मुझ पर पड़ती है, तो मेरा यह अस्तित्व अपने होने की सार्थकता ...